'अर्थपूर्ण जीवनाचा समाजात शोध' घेण्यासाठी २००६ साली डॉ. अभय आणि डॉ. राणी बंग यांनी तरुणांसाठी विकसित केलेली शिक्षणप्रक्रिया म्हणजे 'निर्माण'...

समाजात सकारात्मक बदल घडवून आणण्यासाठी विविध समस्यांचे आव्हान स्वीकारणा-या व त्याद्वारे स्वत:च्या आयुष्याचा अर्थ शोधू इच्छिणा-या युवा प्रयोगवीरांचा हा समुदाय...

'मी व माझे' याच्या संकुचित सीमा ओलांडून,त्यापलीकडील वास्तवाला आपल्या कवेत घेण्यासाठी स्वत:च्या बुद्धीच्या,मनाच्या व कर्तृत्वाच्या कक्षा विस्तारणा-या निर्माणींच्या प्रयत्नांचे संकलन म्हणजे "सीमोल्लंघन"!

गेल्या तीन महिन्यातील निर्माणींच्या धडपडींचे थोडक्यात पण नेमके वृत्त आपल्यासाठी घेऊन येतील अमोल amolsd07[at]gmail[dot]com आणि सतीश गिरसावळे girsawale.sg[at]gmail[dot]com व सीमोल्लंघन टीम!

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Saturday, 1 July 2017

कविता - मापदण्ड बदलो

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते-सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नई राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आँधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना
तब और भी बड़े पैमाने पर
मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आज़माने को
धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी ।
एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।

ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
ये मुझको उकसाते हैं ।
पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
क़सम देती हैं ।
कुछ हो अब, तय है
मुझको आशंकाओं पर क़ाबू पाना है,
पत्थरों के सीने में
प्रतिध्वनि जगाते हुए
परिचित उन राहों में एक बार
विजय-गीत गाते हुए जाना है
जिनमें मैं हार चुका हूँ ।

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

-          दुष्यंतकुमार

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