'अर्थपूर्ण जीवनाचा समाजात शोध' घेण्यासाठी २००६ साली डॉ. अभय आणि डॉ. राणी बंग यांनी तरुणांसाठी विकसित केलेली शिक्षणप्रक्रिया म्हणजे 'निर्माण'...

समाजात सकारात्मक बदल घडवून आणण्यासाठी विविध समस्यांचे आव्हान स्वीकारणा-या व त्याद्वारे स्वत:च्या आयुष्याचा अर्थ शोधू इच्छिणा-या युवा प्रयोगवीरांचा हा समुदाय...

'मी व माझे' याच्या संकुचित सीमा ओलांडून,त्यापलीकडील वास्तवाला आपल्या कवेत घेण्यासाठी स्वत:च्या बुद्धीच्या,मनाच्या व कर्तृत्वाच्या कक्षा विस्तारणा-या निर्माणींच्या प्रयत्नांचे संकलन म्हणजे "सीमोल्लंघन"!

गेल्या तीन महिन्यातील निर्माणींच्या धडपडींचे थोडक्यात पण नेमके वृत्त आपल्यासाठी घेऊन येतील अमोल amolsd07[at]gmail[dot]com आणि सतीश गिरसावळे girsawale.sg[at]gmail[dot]com व सीमोल्लंघन टीम!

निर्माणबद्दल अधिक माहितीसाठी - http://nirman.mkcl.org; www.facebook.com/nirmanforyouth

Wednesday, 4 April 2018

पानी में घिरे हुए लोग

पानी में घिरे हुए लोग
प्रार्थना नहीं करते
वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को
और एक दिन
बिना किसी सूचना के
खच्चर बैल या भैंस की पीठ पर
घर-असबाब लादकर
चल देते हैं कहीं और

यह कितना अद्भुत है
कि बाढ़ चाहे जितनी भयानक हो
उन्हें पानी में थोड़ी-सी जगह ज़रूर मिल जाती है
थोड़ी-सी धूप
थोड़ा-सा आसमान
फिर वे गाड़ देते हैं खम्भे
तान देते हैं बोरे
उलझा देते हैं मूंज की रस्सियां और टाट
पानी में घिरे हुए लोग
अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध
वे ले आते हैं आम की गुठलियां
खाली टिन
भुने हुए चने
वे ले आते हैं चिलम और आग

फिर बह जाते हैं उनके मवेशी
उनकी पूजा की घंटी बह जाती है
बह जाती है महावीर जी की आदमकद मूर्ति
घरों की कच्ची दीवारें
दीवारों पर बने हुए हाथी-घोड़े
फूल-पत्ते
पाट-पटोरे
सब बह जाते हैं
मगर पानी में घिरे हुए लोग
शिकायत नहीं करते
वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में
कहीं न कहीं बचा रखते हैं
थोड़ी-सी आग

फिर डूब जाता है सूरज
कहीं से आती हैं
पानी पर तैरती हुई
लोगों के बोलने की तेज आवाजें
कहीं से उठता है धुआं
पेड़ों पर मंडराता हुआ
और पानी में घिरे हुए लोग
हो जाते हैं बेचैन

वे जला देते हैं
एक टुटही लालटेन
टांग देते हैं किसी ऊंचे बांस पर
ताकि उनके होने की खबर
पानी के पार तक पहुंचती रहे

फिर उस मद्धिम रोशनी में
पानी की आंखों में
आंखें डाले हुए
वे रात-भर खड़े रहते हैं
पानी के सामने
पानी की तरफ
पानी के खिलाफ

सिर्फ उनके अंदर
अरार की तरह
हर बार कुछ टूटता है
हर बार पानी में कुछ गिरता है
छपाक........छपाक.......
                  -          केदारनाथ सिंह

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